डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी की दोस्ती का वो सच जो कोई नहीं बताता

डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी की दोस्ती का वो सच जो कोई नहीं बताता

जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी को 'टफ कुकी' यानी सख्त मिजाज नेता कहते हैं, तो बात सिर्फ डिप्लोमेसी तक सीमित नहीं रहती। हाल ही में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने दोनों नेताओं की केमिस्ट्री को लेकर कुछ ऐसा कहा जिसने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल मचा दी है। खबर सीधी है। ट्रंप अगले साल यानी 2027 की शुरुआत में भारत आ सकते हैं। लेकिन इस दोस्ती और दौरे के पीछे की जो असली कहानी है, वो अखबार की हेडलाइंस से कहीं ज्यादा गहरी है।

लोग अक्सर भारत-अमेरिका संबंधों को केवल समझौतों के तराजू पर तौलते हैं। ये बिल्कुल गलत तरीका है। ट्रंप और पीएम नरेंद्र मोदी के बीच का रिश्ता महज दो देशों के प्रमुखों का नहीं है। ये पर्सनल है। जब सर्जियो गोर ने एक इंटरव्यू में बताया कि दोनों नेता एक जैसा सोचते हैं, तो उनका इशारा केवल बयानों तक नहीं था। असली खेल तो परदे के पीछे चल रहा है, जहां दोनों देश एक बड़े ट्रेड डील को फाइनल करने की कगार पर हैं।

जब बीच इवेंट में बज उठी ट्रंप की रिंगटोन

कूटनीति में अक्सर सब कुछ पहले से तय होता है। स्क्रिप्टेड होता है। मगर नई दिल्ली में जब अमेरिकी दूतावास के एक कार्यक्रम में सर्जियो गोर ने सीधे व्हाइट हाउस फोन लगा दिया, तो कोई भी इसके लिए तैयार नहीं था। फोन की दूसरी तरफ खुद डोनाल्ड ट्रंप थे। उन्होंने लाइव कॉल पर जो कहा, उसने सारी औपचारिकताएं तोड़ दीं। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि वे भारत से प्यार करते हैं और प्रधानमंत्री मोदी के बहुत बड़े फैन हैं।

ये कोई चुनावी जुमला नहीं था। ट्रंप ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी में ये बातें कहीं। इस वाकये से एक बात साफ हो जाती है। वाशिंगटन में बैठी सरकार भारत को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रख रही है।

टैरिफ का वो विवाद जो अब सुलझने वाला है

कुछ समय पहले जब अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 50% से ज्यादा का भारी टैरिफ थोप दिया था, तब लगने लगा था कि दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते ठंडे बस्ते में चले जाएंगे। आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया था कि यह दोस्ती सिर्फ दिखावा है। लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत अलग थी। भारत अपने रुख पर अड़ा रहा। किसानों और छोटे उद्यमियों के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया।

अब जो फ्रेमवर्क सामने आ रहा है, उसके मुताबिक अमेरिका इस टैरिफ को घटाकर 18% करने पर सहमत हो गया है। इसे आप भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत कह सकते हैं। टेक्सटाइल, चमड़ा, फुटवियर और घरेलू सजावट के सामान बनाने वाले भारतीय कारोबारियों के लिए अमेरिकी बाजार के दरवाजे फिर से चौड़े होने जा रहे हैं।

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क्या वाकई 2027 का दौरा गेम चेंजर... नहीं, ये तो बस शुरुआत है

सर्जियो गोर ने साफ कर दिया है कि वे खुद इस दौरे की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए लगातार दिल्ली और वाशिंगटन के चक्कर काट रहे हैं। ट्रंप का यह दौरा सिर्फ हाथ मिलाने और फोटो खिंचवाने के लिए नहीं हो रहा है। इसके पीछे तीन बड़े एजेंडे काम कर रहे हैं।

पहला है डिफेंस सेक्टर। अमेरिका अब भारत को सिर्फ एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद पार्टनर के रूप में देख रहा है। दूसरा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर। इस क्षेत्र में चीन के दबदबे को तोड़ने के लिए दोनों देशों का साथ आना मजबूरी भी है और जरूरत भी।

तीसरा एजेंडा सबसे चौंकाने वाला है। यह है वेनेजुएला के कच्चे तेल को लेकर एक त्रिकोणीय व्यवस्था। वेनेजुएला भारी कच्चे तेल (heavy crude) का उत्पादन करता है। दुनिया में बहुत कम देशों के पास इसे रिफाइन करने की क्षमता है। भारत के पास यह ताकत है। अमेरिका चाहता है कि भारत इस तेल को रिफाइन करे ताकि वैश्विक बाजार में ईंधन की सप्लाई बनी रहे और कीमतें काबू में रहें।

इस रिश्ते पर जो लोग सवाल उठाते हैं

बहुत से विश्लेषक कहते हैं कि ट्रंप की नीतियां अनप्रेडिक्टेबल हैं। वे कब क्या फैसला ले लें, कोई नहीं जानता। यह बात कुछ हद तक सच भी है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ट्रंप और मोदी के बीच एक साझा समझ है। दोनों ही नेता अपने देश के हितों को सबसे आगे रखते हैं। जब दोनों तरफ 'इंडिया फर्स्ट' और 'अमेरिका फर्स्ट' की सोच वाले नेता हों, तो तालमेल बिठाना आसान हो जाता है क्योंकि दोनों को पता होता है कि सामने वाला क्या चाहता है।

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जी-7 समिट के दौरान फ्रांस में दोनों नेताओं के बीच एक घंटे से ज्यादा लंबी बातचीत हुई थी। उस मुलाकात के बाद ही रिश्तों में जमी बर्फ पिघलनी शुरू हुई। ट्रंप ने तब यहां तक कह दिया था कि अगर भारत पर कोई संकट आता है, तो अमेरिका उसके साथ मजबूती से खड़ा रहेगा।

अगले कुछ हफ्तों में इस ट्रेड डील की बारीक भाषा पर दोनों देश दस्तखत करने वाले हैं। यूरोपीय संघ के साथ जो व्यापार समझौता पिछले बीस सालों में नहीं हो पाया, उसे मोदी और ट्रंप की जोड़ी ने महज डेढ़ साल में हकीकत के करीब पहुंचा दिया है।

भारतीय निर्यातकों को अब अमेरिकी बाजार की नई गाइडलाइंस के हिसाब से अपनी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। खासकर कपड़ा और हस्तशिल्प उद्योग से जुड़े लोगों को अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ाने पर ध्यान देना होगा क्योंकि अगले साल की शुरुआत में जब ट्रंप भारत की धरती पर कदम रखेंगे, तब तक व्यापार की नई शर्तें लागू हो चुकी होंगी।

RM

Ryan Murphy

Ryan Murphy combines academic expertise with journalistic flair, crafting stories that resonate with both experts and general readers alike.